Hindu Vijay Yug Pravartak – Hindi

140.00

2 in stock

Compare

Description

इस पुस्तक को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और  पूर्व सरकार्यवाह रहे श्री हो. वे . शेषाद्री जी ने लिखा । शेषाद्री जी को १९८२ में कर्णाटक साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया । इस पुस्तक में वे लिखते हैं , 

” शिवाजी के किसी अन्य कार्य से अधिक, उनकी मृत्यु के बाद हुई घटनाओं और अविश्वसनीय रूप से संभाजी के बर्बरतापूर्ण बलिदान ने उस दृष्टि और उद्देश्य को उजागर किया था, जो शिवाजी ने अपनी विरासत के तौर पर छोड़ा था। शिवाजी के न रहने पर औरंगजेब स्वयं उनके राज्य पर चढ़ आया और उसे रौंद डाला। पर शीघ्र ही समूचा क्षेत्र मानो दावानल बन गया। प्रत्येक घर एक किला और शारीरिक रूप से योग्य हर युवा हिंदवी स्वराज का सैनिक बन गया था।

अप्रतिम वीरता और छापामार पद्धति के नए सेनापति सामने आए, जिन्होंने शत्रुओं की सेना पर जोरदार हमले किए। उनमें से एक धनाजी तो औरंगजेब के शाही तंबू तक जा पहुंचा था, पर दुर्भाग्य से औरंगजेब वहां नहीं था। धनाजी उसके शाही तंबू का स्वर्ण चिन्ह लेकर लौटा था। अपनी विशाल सेना और सभी पारंगत योद्धाओं के बावजूद औरंगजेब को चार वर्ष तक चले लंबे संघर्ष में आखिरकार स्वराज की धूल खानी पड़ी और उसकी कब्र दक्षिण में औरंगाबाद, जिसका नाम अब संभाजी नगर रख दिया गया है, में ही बनी। उसके साथ ही मुगलों के उत्कर्ष और उनकी ताकत का भी अंत हो गया। और इस तरह स्वराज के चढ़ते सूरज के साथ भगवा प्रभात का आगमन हुआ। ” – हो.वे. शेषाद्री जी 

The author of the book , Sri H.V.Seshadri was the former Sarkaryavah ( General Secretary ) of the RSS.  An excellent writer, he received the Karnataka State Sahitya Akademi Award in 1982.

He writes in this book,

” More than any other step by Shivaji, the developments following his passing away and the unbelievably inhuman martyrdom of Sambhaji denoted the vision and mission that Shivaji had bequeathed to posterity. Finding that the dreaded Shivaji was no more, Aurangzeb himself descended on his kingdom and over-ran it forcefully. But soon enough, the whole area seemed to be on fire. Every house became a fort and every able-bodied youth a soldier of Hindavi Swaraj. New commanders displaying unparallel heroism and ability in guerilla warfare rose up to launch fierce attacks on the enemy’s force. One, Dhanaji, pierced right up to Aurangzeb’s royal tent, but as luck would have it, the latter was away, so Dhanaji carried away the golden insignia on his royal tent! In spite of a four-year-long struggle with a vast army and able war veterans, Aurangzeb succumbed to the attack to eat the dust of Swaraj and was buried at Aurangabad in the south, now named Sambhaji Nagar. Along with him lay forever buried the glory and power of the mighty Mughals. It also heralded the saffron morning of the rising sun of Swaraj”. – Sri H.V.Seshadri, 

  •  ISBN 978-8189622947; Paperback 321 pages, Suruchi Prakashan

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Hindu Vijay Yug Pravartak – Hindi”